PM Modi Degree Row: दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) के 2016 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्नातक डिग्री से संबंधित जानकारी का खुलासा करने का निर्देश दिया गया था। जस्टिस सच्चिन दत्ता ने यह फैसला सुनाया, जो 27 फरवरी को सुनवाई के बाद सुरक्षित रखा गया था। यह मामला एक आरटीआई आवेदन से शुरू हुआ था, जिसमें 1978 में बीए परीक्षा पास करने वाले सभी छात्रों के रिकॉर्ड की जांच की मांग की गई थी, उसी वर्ष जब पीएम मोदी ने अपनी स्नातक डिग्री प्राप्त की थी। हाईकोर्ट ने 23 जनवरी 2017 को सीआईसी के आदेश पर रोक लगा दी थी।
PM Modi Degree Row: डीयू का तर्क और गोपनीयता का अधिकार
दिल्ली विश्वविद्यालय ने तर्क दिया कि छात्रों की जानकारी विश्वासगत अभिरक्षा में रखी जाती है और इसे आरटीआई कानून के तहत खुलासा करने से छूट प्राप्त है। विश्वविद्यालय ने कहा कि सीआईसी का आदेश सभी विश्वविद्यालयों के लिए दूरगामी नकारात्मक परिणाम पैदा कर सकता है, जो करोड़ों छात्रों की डिग्रियों का रिकॉर्ड रखते हैं। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता, जो डीयू का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, ने तर्क दिया कि व्यक्तिगत जानकारी का खुलासा केवल सार्वजनिक हित में ही किया जा सकता है, न कि महज जिज्ञासा के आधार पर। मेहता ने स्पष्ट किया कि विश्वविद्यालय को अदालत को रिकॉर्ड दिखाने में कोई आपत्ति नहीं है, और पुष्टि की कि 1978 में बीए की डिग्री मौजूद है।
PM Modi Degree Row: सीआईसी का 2016 का आदेश और विवाद की शुरुआत
यह विवाद 2016 में नीरज नामक एक व्यक्ति द्वारा दायर आरटीआई आवेदन से शुरू हुआ, जिसमें 1978 में बीए परीक्षा में शामिल हुए सभी छात्रों के रोल नंबर, नाम, पिता का नाम, अंक और परिणाम की जानकारी मांगी गई थी। सीआईसी ने 21 दिसंबर 2016 को डीयू को निर्देश दिया था कि वह इन रिकॉर्ड्स की जांच की अनुमति दे और प्रासंगिक पृष्ठों की प्रमाणित प्रतियां प्रदान करे। सीआईसी ने तर्क दिया था कि सार्वजनिक व्यक्ति, विशेष रूप से प्रधानमंत्री की शैक्षिक योग्यताएं पारदर्शी होनी चाहिए और विश्वविद्यालय के रजिस्टर को सार्वजनिक दस्तावेज माना जाना चाहिए। हालांकि, डीयू ने इसे तीसरे पक्ष की निजी जानकारी बताकर खुलासा करने से इनकार कर दिया था।
PM Modi Degree Row: हाईकोर्ट का तर्क: निजता बनाम सार्वजनिक हित
जस्टिस दत्ता ने अपने फैसले में कहा कि सार्वजनिक हित और “जो जनता के लिए रुचिकर हो” में अंतर है। उन्होंने स्पष्ट किया कि शैक्षिक योग्यताएं किसी सार्वजनिक पद के लिए वैधानिक आवश्यकता नहीं हैं, और इसलिए इनका खुलासा करना आवश्यक नहीं है। अदालत ने माना कि किसी सार्वजनिक व्यक्ति की निजी जानकारी, जो उनके कर्तव्यों से असंबंधित है, गोपनीयता के अधिकार के तहत संरक्षित है। जस्टिस दत्ता ने सीआईसी के दृष्टिकोण को पूरी तरह से गलत करार दिया और कहा कि ऐसी जानकारी का खुलासा सनसनीखेज मांगों को बढ़ावा दे सकता है।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और पुराना विवाद
कांग्रेस ने इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह “अस्पष्ट” है कि पीएम की शैक्षिक डिग्री को पूरी तरह से गोपनीय क्यों रखा जाना चाहिए, जबकि अन्य लोगों की ऐसी जानकारी हमेशा सार्वजनिक रही है। आम आदमी पार्टी (आप) ने 2016 में इस मुद्दे को उठाया था, जब उसने दावा किया था कि डीयू के रिकॉर्ड में नरेंद्र दामोदरदास मोदी नामक किसी व्यक्ति को डिग्री नहीं दी गई थी। आप ने यह भी आरोप लगाया था कि डिग्री में नाम और वर्ष की विसंगतियां थीं। डीयू के रजिस्ट्रार ने 2016 में पुष्टि की थी कि पीएम मोदी की डिग्री प्रामाणिक है, और नाम में विसंगतियों को लिपिकीय त्रुटि करार दिया था।
यह फैसला न केवल पीएम मोदी के शैक्षिक रिकॉर्ड से संबंधित है, बल्कि यह सभी विश्वविद्यालयों के लिए एक मिसाल कायम करता है कि छात्रों की निजी जानकारी को आरटीआई के तहत खुलासा करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, जब तक कि यह स्पष्ट रूप से सार्वजनिक हित में न हो। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि आरटीआई कानून का उद्देश्य सरकारी कार्यों में पारदर्शिता लाना है, न कि सनसनीखेज जिज्ञासाओं को बढ़ावा देना। इस मामले ने लंबे समय तक राजनीतिक और कानूनी बहस को जन्म दिया, लेकिन हाईकोर्ट के इस फैसले ने इस विवाद पर एक महत्वपूर्ण विराम लगाया है।
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